
रांची
कारगिल विजय दिवस मेरे लिए केवल विजय का पर्व नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है जिसने भारतीय सेना को दुनिया की सबसे अनुशासित और विश्वसनीय सेनाओं में स्थान दिलाया। कारगिल संघर्ष के दौरान मैं भारतीय सेना की ईएमई (इलेक्ट्रिकल एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स) शाखा में था।
हमारी जिम्मेदारी अग्रिम मोर्चे पर लड़ रहे सैनिकों तक तकनीकी सहायता पहुंचानी थी। इस दौरान सांबा सेक्टर, चक दयाला, डेरा बाबा नानक, नागौर और जोधपुर जैसे अनेक सैन्य क्षेत्रों में लगातार आवाजाही रही। सेना में न जाति का भेद होता है, न भाषा का-सिर्फ एक पहचान होती है, भारत माता का सैनिक।
उन दिनों की एक घटना आज भी मन को भावुक कर देती है। डेरा बाबा नानक (पंजाब) में सरसों और गेहूं की लहलहाती फसलों के बीच हमारी दस सदस्यीय टीम ने तंबू लगाया था। थोड़ी देर बाद एक बुज़ुर्ग माताजी आईं और स्नेह से बोलीं, "बेटा, आज खाना मत बनाना।" कुछ समय बाद वे घी लगी गरम-गरम रोटियां, दाल और सब्जी लेकर लौटीं।
उस भोजन में केवल स्वाद नहीं था, उसमें पूरे देश का स्नेह और विश्वास समाया था। तभी मुझे लगा कि जिस देश की माताएं और बहनें सैनिकों को अपना बेटा मानती हैं, उस देश का सैनिक कभी अकेला नहीं हो सकता।
मेरी दृष्टि में सैनिक मातृभूमि की त्वचा की तरह है। शरीर कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि उसकी त्वचा सुरक्षित न रहे तो वह अनेक संकटों के प्रति असुरक्षित हो जाता है। उसी प्रकार सीमा सुरक्षित है तो राष्ट्र सुरक्षित है।
एक और घटना आज भी स्मृतियों में ताजा है।
मैं छुट्टी बिताकर अपनी यूनिट लौट रहा था। उन दिनों सैनिकों के लिए रेल में आरक्षण कराना आज की तरह आसान नहीं था। हम सैनिक भी प्रायः आरक्षित सीट पर किसी यात्री को असुविधा देकर बैठना उचित नहीं समझते थे, इसलिए अधिकांश समय टीटीई के डिब्बे के पास, दरवाज़े के निकट खड़े होकर ही यात्रा कर लेते थे। उस दिन भी मैं वहीं खड़ा था।
संयोग से उसी डिब्बे में एक जनप्रतिनिधि (शायद कोई नेता) यात्रा कर रहे थे। किसी बात पर यात्रियों ने उनका विरोध करते हुए ज़ोरदार हूटिंग शुरू कर दी। उसी दौरान लोगों की नज़र मुझ पर पड़ी। जब उन्हें पता चला कि मैं सेना का जवान हूं, तो उन्होंने टीटीई पर दबाव डालकर मेरे लिए एक सीट की व्यवस्था करवाई।
उस क्षण मन में दो भाव एक साथ आए। एक ओर देशवासियों के स्नेह और सम्मान को देखकर गर्व हुआ, वहीं दूसरी ओर यह विचार भी आया कि हमारे सैनिकों की याद और सम्मान अक्सर केवल युद्ध, संकट या आपातकाल के समय ही क्यों बढ़ जाता है?
मेरा विनम्र मानना है कि जो सम्मान सैनिकों को कठिन परिस्थितियों में मिलता है, वही सम्मान उन्हें सामान्य दिनों में भी मिलना चाहिए। क्योंकि सीमाओं की सुरक्षा का दायित्व केवल युद्ध के दिनों में नहीं, बल्कि वर्ष के हर दिन और हर पल निभाया जाता है।
26 साल बाद भी लगता है जैसे अभी की घटना हो
राज बहादुर सिंह, सूबेदार। कारगिल युद्ध के समय में जम्मू से 63 इंजीनीयर रेजीमेंट एलआर डब्ल्यू में पोस्टेड था। अचानक मेरी यूनिट को आरएस पुरा सेक्टर, जो बिल्कुल पाकिस्तान का बार्डर है, जाने का आदेश मिला।
यूनिट के साथ हमे भी जाने का सौभाग्य मिला। उस समय मेरी उम्र 21 साल थी। काफी उमंग था कि हमे देश के लिए कुछ करने का मौका मिला। सैनिक के जीवन का तो यही सपना होता कि दुश्मन के साथ दो-दो हाथ करें। हमें भी यह मौका मिल ही गया।
इंजीनियर रेजीमेंट का काम बार्डर इलाके में माइन लगाना, रोड बनाना, बंकर का मरम्मत करना, ब्रिज बनाना ढेर सारे काम होते हैं ताकि बाकी सैनिकों को आने-जाने और रहने में कोई दिक्कत न हो। इसी दौरान हम सबसे पहले आर पूरा सेक्टर के कोरली गांव पहुंचे।
रात का समय था। बंकर में रहना था। पर उस रात भी वहां के गांव वालों ने उस बार्डर इलाके में खाने पीने से लेकर हर तरह की हमारी मदद की। खास कर उनके यहां की लस्सी आज भी याद है। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी पर गांव वालों का प्यार और भारतीय सेना के प्रति उनका प्रेम काबिले तारीफ थी।
26 जुलाई को आपरेशन विजय खत्म हुआ और इसके बाद आपरेशन पराक्रम शुरू हुआ और हमलोग सालों तक बंकर में रहे पर उनका प्यार और सहयोग कम नहीं हुआ। यही देश की जनता का प्यार हमें 30 सालों तक सेना में रहने पर के लिए प्रेरित करता रहा। आज 26 साल बाद भी लगता है जैसे अभी की घटना हो।
भारत की विजय हुई। हर तरफ तिरंगा लहराया। पूरा देश हर्ष और उल्लास में डूब गया। इसी दौरान घर आने पर सभी का सम्मान मिला। देश का तिरंगा कभी झुकने नहीं देंगे।
गुमला के वीर सपूत बिरसा उरांव… जिनकी जिद बनी देशभक्ति की मिसाल
कारगिल विजय दिवस केवल भारत की सैन्य विजय का पर्व नहीं, बल्कि उन वीर सपूतों को नमन करने का अवसर भी है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। गुमला के सिसई प्रखंड स्थित बर्री जतराटोली गांव के बलिदानी हवलदार बिरसा उरांव ऐसे ही अमर योद्धा हैं, जिनकी देशभक्ति और दृढ़ संकल्प आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा है।
12 अक्टूबर 1965 को बुदू उरांव के घर जन्मे बिरसा उरांव बचपन से ही सेना की वर्दी पहनने का सपना देखते थे। वर्ष 1983 में मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान फुटबाल खेलते समय उनका चयन बिहार रेजिमेंट में हो गया। उन्होंने परिवार को बताए बिना दानापुर जाकर प्रशिक्षण लिया और छह माह बाद जब घर लौटे, तब परिवार को उनके सेना में भर्ती होने की जानकारी मिली।
कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन और साहस के बल पर वे साधारण सैनिक से नायक और फिर हवलदार बने। नगालैंड, पंजाब, असम तथा संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन (दक्षिण अफ्रीका) में उत्कृष्ट सेवाएं देने के बाद वर्ष 1999 के आपरेशन विजय में उन्होंने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर दुश्मनों से लोहा लिया। मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया और हमेशा के लिए अमर हो गए।
उनकी वीरता के सम्मान में उन्हें सामान्य सेवा पदक (नगालैंड), 9 ईयर लांग सर्विस मेडल, सैनिक सुरक्षा मेडल, संयुक्त राष्ट्र ओवरसीज मेडल, बिहार रेजिमेंट स्वर्ण जयंती पदक तथा मरणोपरांत विशिष्ट सेवा मेडल सहित कई सम्मान प्रदान किए गए।
बलिदानी हवलदार बिरसा उरांव की पत्नी मीला उरांव बताती हैं कि उनके बलिदान की सूचना परिवार को एक सप्ताह बाद मिली थी। सरकार से मिली आर्थिक सहायता और गैस एजेंसी के सहारे उन्होंने परिवार का पालन-पोषण किया। उनकी बड़ी बेटी आज झारखंड पुलिस में दारोगा के पद पर कार्यरत हैं, जबकि बेटा पढ़ाई कर रहा है।
परिवार की इच्छा है कि बलिदानी बिरसा उरांव की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए उनके गांव तक उनके नाम से पक्की सड़क तथा घाघरा प्रखंड के गम्हरिया में उनके नाम का तोरण द्वार बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस वीर सपूत के अदम्य साहस, देशभक्ति और सर्वोच्च बलिदान को सदैव याद रखें।



