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हरियाणा के किसानों ने बदली तस्वीर, पराली जलाने के बजाय अपना रहे वैज्ञानिक तरीके

फरीदाबाद

 हरियाणा में गेहूं कटाई के बाद फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर किसानों में काफी जागरूकता देखने को मिल रही है. दरअसल पहले जहां खेतों में बचे डंठलों (फाने) और पराली को जला दिया जाता था. वहीं अब किसान वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर न केवल पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे रहे हैं, बल्कि अपनी भूमि की उर्वरता भी बढ़ा रहे हैं.

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसल अवशेष जलाना खेती के लिए हानिकारक कदम है, क्योंकि इससे मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं. जैविक कार्बन की मात्रा घटती है और खेत की उत्पादक क्षमता प्रभावित होती है. साथ ही इससे निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण और तापमान वृद्धि का कारण बनता है, यही वजह है कि कृषि विभाग लगातार किसानों को जागरूक कर रहा है और इसके साथ ही फसल अवशेष जलाने वाले किसानों पर कई जगह कानूनी कार्रवाई भी की जा रही हैं.

पराली को जलाया नहीं बल्कि मिट्टी में मिला दिया
बता दे कि इस दिशा में अंबाला जिला पूरे प्रदेश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया है. क्योंकि इस वर्ष जिले में गेहूं की कटाई पूरी होने के बाद किसानों ने फसल अवशेषों का प्रबंधन अत्यंत जिम्मेदारी के साथ किया है. फसलों के फाने (डंठलों) को जलाने के बजाय किसानों ने रोटावेटर, हैप्पी सीडर और मल्चर जैसी आधुनिक मशीनों का उपयोग करके उन्हें मिट्टी में मिला दिया. इससे अवशेष धीरे-धीरे सड़कर प्राकृतिक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं, जिससे मिट्टी में उर्वरक शक्ति बढ़ती है और जल धारण क्षमता मजबूत होती है. खासतौर पर इस वैज्ञानिक पद्धति से खेत की सेहत सुधरती है और आने वाली फसलों को बेहतर पोषण मिलने के साथ साथ पशुओं के लिए भूसे की व्यवस्था भी होती हैं.

ढैंचा की खेती के लिए किया जा रहा जागरूक
कृषि विभाग की निरंतर जागरूकता का परिणाम है. कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि गेहूं कटाई के बाद खाली पड़े खेतों का बेहतर उपयोग करने के लिए किसानों को ढैंचा की खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है. क्योंकि ढैंचा एक महत्वपूर्ण दलहनी हरी खाद फसल है, जो मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिर करती है और भूमि की प्राकृतिक उर्वरता को बढ़ाती है. इसकी खेती के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 25 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है ओर बुवाई के 30 से 40 दिन बाद इस फसल को खेत में पलटकर मिट्टी में मिला दिया जाता है, जिससे जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है.

रासायनिक खाद से कम होती है उर्वरता
लगातार यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी के लाभकारी जीवों की संख्या घट रही है, जिससे भूमि की शक्ति कमजोर हो रही है और खेती की लागत बढ़ रही है.उन्होंने कहा कि ऐसे में ढैंचा जैसी हरी खाद फसलें किसानों के लिए कम खर्च में अधिक लाभ देने वाला विकल्प साबित हो रही हैं. सरकार भी इस पहल को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रति एकड़ ढैंचा की खेती पर 1,000 रुपये का अनुदान दे रही है तथा बीज सब्सिडी पर उपलब्ध करा रही है. वहीं अंबाला जिले के किसानों ने यह साबित कर दिया है कि यदि आधुनिक तकनीक, सरकारी योजनाओं और वैज्ञानिक सोच को अपनाया जाए तो खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है. फसल अवशेष न जलाने और हरी खाद को अपनाने की यह पहल हरियाणा के अन्य जिलों के किसानों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बन रही है.

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